Wednesday, 28 August 2013
Tuesday, 16 July 2013
दृश्यकथा
मिथलेश शरण चौबे
मुफीद इंतजाम करना था
मुल्क की खुशहाली के लिए वहाँ बैठकर
ज्यादा ठीक के लिए अनिवार्य विचार
सुदूर गाँवों-नगरों की आवाम की
जरूरतों को पहचानकर
उन्हें मनुष्य-भर जी पाने की
अदद उम्मीद के जरूरी इंतजामों पर बहस करना थी
सुरक्षित और सुकून से रहे आवाम
एक मुकम्मल मुल्क होने से मिलीं
सारी आजादियाँ दिलाकर उन्हें
आजाद जीवन देने का
अपरिहार्य कर्म करना था
करोड़ों रुपये प्रति मिनिट खर्च होते हैं
उनके वहाँ होने पर
बत्तीस रुपये में पेट नहीं भरता
कर्ज और आपदाओं में लगातार
मौत को चुन रहे हैं किसान
विकास के भूत से
रोजमर्रा के संकट नहीं भागते
एक इमारत के संडास पर
लाखों रुपये खर्च करने वाले समय में
आज भी सिर पर मैला ढ़ोते हैं आदमी
पैसठ बरस पहले स्वाधीन हो चुके देश में
यहाँ बैठे हुए लोग आम आदमी से
शालीनता की अपील करते हैं
मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं
हदों में रहने की सीख देते हैं
कुछ तो विरोध को कुचलना भी
गलत नहीं मानते
बहुतों पर बड़े-बड़े दाग हैं
जिन पर नहीं हैं उन पर चिपकी हैं
अनंत चुप्पियाँ
ईमानदारी नैतिकता वहाँ से
निर्वासित हो चुकी हैं
कुछ सही लोग भी होंगे निष्क्रिय
कभी भी पदासीन होने का गुमान वहाँ तैरता है
अब भी प्रतीक्षा में रहने की बैचेनी मंडराती है
गली-मुहल्लों के लड़ाई-झगड़ों से
ज्यादा गर्हित होती है लड़ाई यहाँ
हट्ट-हट्ट बोलकर
आम आदमी की अभिव्यक्ति का
मजाक बना रहा है
एक मसखरा यहाँ
चीखकर चिल्लाकर
गरीबी आत्महत्या
मंहगाई भ्रष्टाचार को
मुखर ही नहीं होने देते यहाँ पर
हिंदी बोल सकने के बावजूद
अंग्रेजी में अटपटा सा बोलते लोग
टेलीविजन में उनके तमाशे देखकर
लोग अब चौकते नहीं हैं
कोई आश्चर्य नहीं करते
दोनों तरफ की सधी-सधाई पटकथा पर
लोग अपनी निरुपायता पर
भले ही क्षुब्ध हों अपनी जुबां को
ख़राब करना नहीं चाहते
पढ़े-लिखे समझदार कहे जाने वाले
बहुसंख्यक लोगों को इसमें कोई रूचि नहीं है
इस सबसे छेड़खानी करना उन्हें
सिरफिरे लोगों की महत्वाकांक्षा लगती है और
उन्हें दुःख है कि कविता में नृत्य में नाटक में
अब जनता की रुचि नहीं रही
चौबीसों घंटे रोजमर्रा के संघर्षों में
पिसती रियाया का कोई सौंदर्यबोध ही नहीं है
अलबत्ता इतना जरूर कहते हैं बुद्धिजीवी कि
कलाएं अब हाशिये पर हैं
पता नहीं क्यों उस इमारत में बैठे
नुमाइंदों की तरफ धीरे-धीरे
सरक रहे हैं वे
तार-तार हो रही मनुष्यता
सामंतों के क़दमों में
पल रही राजनीति
आम आदमी को वहाँ पहुँचने की
चुनौती देता है
अपने ही घर में अपनी पत्नी की
जमानत जब्त करा चुका एक मंत्री
लोहिया-जेपी के पीछे
चलते-चलते नेता हुए लोग
पूँजीवाद के बड़े और भद्दे दाग बन चुके हैं और
उन्हीं का नाम लेकर
अनर्गल भाषा में क्रूरता से
झल्लाते हैं आम आदमी पर
गाँधी यदि होते तो क्या उनको बख्शते
उन्हीं का नाम लेकर चलने वाले लोग
जिनका जो काम होना चाहिए
उसके सिवा उन्हें और भी काम हैं
और जिन्हें उन पर प्रश्नचिह्न लगाना चाहिए
वे अपनी बारी की व्यग्रता में डूबे हैं
हालांकि अपने वेतन भत्ते सुविधाओं पर
मिनिटभर में आमराय बना लेते हैं
अब तक बड़ी राष्ट्रीय समस्याओं पर
मतैक्य न बन पाए लोग
भूख से गरीबी से शोषण से
प्राकृतिक आपदाओं से
भ्रष्टाचार से मंहगाई से
लड़ते जूझते आम मनुष्य को
बहुत दूर से दिखाई देती
उस भव्य इमारत के
अन्दर के दृश्य निराश करते हैं
उनकी दमघौटू बेचैनी
निरुपाय है
गलेंगे खपेंगे मरेंगे
एक दिन वे सभी
खुले आसमान में जी भर के
सांस ले पाने का उनका
स्वप्न अब भी जीवित है
इतिहास में दर्ज हैं
कई खंडहर हो चुकी भव्यताएं
जिन्दगी सपना दिखाती है
कभी वह सच में भी
बदल सकता है ।
मिथलेश शरण चौबे
मुफीद इंतजाम करना था
मुल्क की खुशहाली के लिए वहाँ बैठकर
ज्यादा ठीक के लिए अनिवार्य विचार
सुदूर गाँवों-नगरों की आवाम की
जरूरतों को पहचानकर
उन्हें मनुष्य-भर जी पाने की
अदद उम्मीद के जरूरी इंतजामों पर बहस करना थी
सुरक्षित और सुकून से रहे आवाम
एक मुकम्मल मुल्क होने से मिलीं
सारी आजादियाँ दिलाकर उन्हें
आजाद जीवन देने का
अपरिहार्य कर्म करना था
करोड़ों रुपये प्रति मिनिट खर्च होते हैं
उनके वहाँ होने पर
बत्तीस रुपये में पेट नहीं भरता
कर्ज और आपदाओं में लगातार
मौत को चुन रहे हैं किसान
विकास के भूत से
रोजमर्रा के संकट नहीं भागते
एक इमारत के संडास पर
लाखों रुपये खर्च करने वाले समय में
आज भी सिर पर मैला ढ़ोते हैं आदमी
पैसठ बरस पहले स्वाधीन हो चुके देश में
यहाँ बैठे हुए लोग आम आदमी से
शालीनता की अपील करते हैं
मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं
हदों में रहने की सीख देते हैं
कुछ तो विरोध को कुचलना भी
गलत नहीं मानते
बहुतों पर बड़े-बड़े दाग हैं
जिन पर नहीं हैं उन पर चिपकी हैं
अनंत चुप्पियाँ
ईमानदारी नैतिकता वहाँ से
निर्वासित हो चुकी हैं
कुछ सही लोग भी होंगे निष्क्रिय
कभी भी पदासीन होने का गुमान वहाँ तैरता है
अब भी प्रतीक्षा में रहने की बैचेनी मंडराती है
गली-मुहल्लों के लड़ाई-झगड़ों से
ज्यादा गर्हित होती है लड़ाई यहाँ
हट्ट-हट्ट बोलकर
आम आदमी की अभिव्यक्ति का
मजाक बना रहा है
एक मसखरा यहाँ
चीखकर चिल्लाकर
गरीबी आत्महत्या
मंहगाई भ्रष्टाचार को
मुखर ही नहीं होने देते यहाँ पर
हिंदी बोल सकने के बावजूद
अंग्रेजी में अटपटा सा बोलते लोग
टेलीविजन में उनके तमाशे देखकर
लोग अब चौकते नहीं हैं
कोई आश्चर्य नहीं करते
दोनों तरफ की सधी-सधाई पटकथा पर
लोग अपनी निरुपायता पर
भले ही क्षुब्ध हों अपनी जुबां को
ख़राब करना नहीं चाहते
पढ़े-लिखे समझदार कहे जाने वाले
बहुसंख्यक लोगों को इसमें कोई रूचि नहीं है
इस सबसे छेड़खानी करना उन्हें
सिरफिरे लोगों की महत्वाकांक्षा लगती है और
उन्हें दुःख है कि कविता में नृत्य में नाटक में
अब जनता की रुचि नहीं रही
चौबीसों घंटे रोजमर्रा के संघर्षों में
पिसती रियाया का कोई सौंदर्यबोध ही नहीं है
अलबत्ता इतना जरूर कहते हैं बुद्धिजीवी कि
कलाएं अब हाशिये पर हैं
पता नहीं क्यों उस इमारत में बैठे
नुमाइंदों की तरफ धीरे-धीरे
सरक रहे हैं वे
तार-तार हो रही मनुष्यता
सामंतों के क़दमों में
पल रही राजनीति
आम आदमी को वहाँ पहुँचने की
चुनौती देता है
अपने ही घर में अपनी पत्नी की
जमानत जब्त करा चुका एक मंत्री
लोहिया-जेपी के पीछे
चलते-चलते नेता हुए लोग
पूँजीवाद के बड़े और भद्दे दाग बन चुके हैं और
उन्हीं का नाम लेकर
अनर्गल भाषा में क्रूरता से
झल्लाते हैं आम आदमी पर
गाँधी यदि होते तो क्या उनको बख्शते
उन्हीं का नाम लेकर चलने वाले लोग
जिनका जो काम होना चाहिए
उसके सिवा उन्हें और भी काम हैं
और जिन्हें उन पर प्रश्नचिह्न लगाना चाहिए
वे अपनी बारी की व्यग्रता में डूबे हैं
हालांकि अपने वेतन भत्ते सुविधाओं पर
मिनिटभर में आमराय बना लेते हैं
अब तक बड़ी राष्ट्रीय समस्याओं पर
मतैक्य न बन पाए लोग
भूख से गरीबी से शोषण से
प्राकृतिक आपदाओं से
भ्रष्टाचार से मंहगाई से
लड़ते जूझते आम मनुष्य को
बहुत दूर से दिखाई देती
उस भव्य इमारत के
अन्दर के दृश्य निराश करते हैं
उनकी दमघौटू बेचैनी
निरुपाय है
गलेंगे खपेंगे मरेंगे
एक दिन वे सभी
खुले आसमान में जी भर के
सांस ले पाने का उनका
स्वप्न अब भी जीवित है
इतिहास में दर्ज हैं
कई खंडहर हो चुकी भव्यताएं
जिन्दगी सपना दिखाती है
कभी वह सच में भी
बदल सकता है ।
कविता के स्वप्न की तरह
स्वप्न में आती है एक कविता
कविता के स्वप्नों से बेखबर
ढेर सारी बची हुई
कामना को तिरोहित कर
साथ में लाई भाषा को
टटोलकर भाषा से बाहर
अपने को पाने के
यत्न की थकान पर
जैसे रोज आएगी नहीं
के साथ आना चाहती
रोज रोज
उसे घेर लेती
स्वप्न की बेतरतीब बनावटें
खारिज करती
बेमानी इच्छाएं
कविता होने से अपदस्थ करता
स्वप्न का बेरुखा अंदाज
लय गति
ठहराव बेचैनी को
फिर भी बचा लेती
रचने के यत्न को
रचने की आकांक्षा को
न रच पाने के क्षोभ को
आती तो है लेकिन
जल्द ही लौटती है
अधबनी कविता की तरह
स्वप्न में आई कविता
कविता के स्वप्न की तरह।
स्वप्न में आती है एक कविता
कविता के स्वप्नों से बेखबर
ढेर सारी बची हुई
कामना को तिरोहित कर
साथ में लाई भाषा को
टटोलकर भाषा से बाहर
अपने को पाने के
यत्न की थकान पर
जैसे रोज आएगी नहीं
के साथ आना चाहती
रोज रोज
उसे घेर लेती
स्वप्न की बेतरतीब बनावटें
खारिज करती
बेमानी इच्छाएं
कविता होने से अपदस्थ करता
स्वप्न का बेरुखा अंदाज
लय गति
ठहराव बेचैनी को
फिर भी बचा लेती
रचने के यत्न को
रचने की आकांक्षा को
न रच पाने के क्षोभ को
आती तो है लेकिन
जल्द ही लौटती है
अधबनी कविता की तरह
स्वप्न में आई कविता
कविता के स्वप्न की तरह।
Friday, 7 June 2013
हिंसा के विरुद्ध
- मिथलेश शरण चौबे
मनुष्य का अतीत से अब तक का सफ़र हिंसा से आक्रान्त रहा है,बुद्ध पुरुषों-धर्मग्रंथों आदि के अहिंसा सम्बन्धी आग्रहों के बावजूद मानव जाति हिंसा की पनाहगार बनी रही| भले ही बोलचाल में हम ऐसा मानते रहे कि हिंसा कुछ उद्दंड लोगों का कायर हथियार है लेकिन बहुसंख्यक आबादी का प्रतिरोध न करना भी उन्हीं हिंसक लोगों के पक्ष में खड़े होने जैसा है |हम आज भी दैनिक जीवन में देखते हैं कि जो लोग आक्रामक होकर कोई काम करा लेते हैं वही काम विनयपूर्वक निवेदन पर कतई नहीं होता |यह दरअसल हिंसा को स्वीकृति देने की शुरुआत है|
छत्तीसगढ़ की ताजा हिंसक वारदात के बहुत सारे विश्लेषण हो सकते हैं जिनमें अपनी-अपनी सामाजिक राजनैतिक समझ और निष्ठा की धार शामिल रहेगी किन्तु सरल अर्थ में हम इसे मनुष्य के लगातार और हिंसक होते चले जाने तथा हिंसा की बढ़ती स्वीकार्यता की तरह ही देखें |आम आदमी और ख़ास आदमी का चलताऊ फर्क हम भले ही करते हैं लेकिन हिंसा के सामने ये अंतर बेमानी हैं, बल्कि यहीं आकर सबकी हैसियत एकमेक हो जाती है जो कि दरअसल होती ही है | राजनैतिक पार्टियों का काम अपने विचारों यदि उनके पास कुछ रहते हों तो,को सार्थक मानना व दूसरी पार्टियों की नीतियों-कृत्यों की निंदा करना उन्हें जन विरोधी साबित करना है ,यह काम सारी पार्टियां तत्परता के साथ करती हैं |चुनाव में जिन मसलों को फसल की तरह काटा जा सके उन्हें मुद्दा बनाना भी उनका परम कर्तव्य होता है |
हिंसा वह विकृत अमानवीय हथियार है जिसका चरम लक्ष्य समूचे जीवन को नष्ट करना ही है ,यहाँ कोई मेरा तुम्हारा नहीं है यहाँ जो है वो मारा जा सकता है ,जो अभी नहीं है के मारे जाने के जरूरी इंतजाम हैं,या कोई जन्म ही न हो ऐसी जीवन विरोधी मंशा है| हम एक घटना की सतही व्याख्या कर मुक्ति पा लेते हैं,उस मूल विषय को नजरअंदाज करते हैं जिसके चलते घटनाएं होती हैं|हिंसा से कोई नहीं बच सकता स्वयं हिंसा के अस्त्र से मनुष्य को इच्छित नियंत्रण में रखने का मुगालता पाले बैठे अमानुष |
राजनैतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति के अभाव का रोना रोते हुए बहुत समय बीत रहा है |उनका काम सही सिरे से समस्या को निराकृत करना है भी नहीं ,वह सभी मनुष्यों का काम हैं |किसी करिश्माई व्यक्तित्व के अवतरण की प्रतीक्षा करना अपनी जवाबदेही से बचना है |हम आत्मावलोकन करें कि कैसे बहुत छोटी घटनाएं या स्थितियां अंततः हिंसक रूप ले लेती हैं और उनसे हम कितनी आसानी से बच सकते हैं| हमारे आसपास बहुतायत होती रहती बेवजह की आक्रामक घटनाओं पर हमारा रवैया उदासीन और संवेदनहीनता की ओर क्यों चला जाता है|दूसरों के अतिक्रमण को हम सरलता से स्वीकृति-सी क्यों देने लगे हैं | हमारी अपनी जरूरतें क्यों दूसरे के अतिक्रमण से पूरी होती हैं|आखिर क्यों विनय,संवेदना,संगति से सरककर हम निर्मम,संवेदनहीन,अराजक होने की तरफ चले जाते हैं|मानवीय प्रतिक्रियाएं क्यों अपर्याप्त लगने लगी हैं|
खुद तो हम भाषा में वाणी में व्यवहार में कठोर होते जा रहे हैं और समूचे परिवेश में पसरती जा रही असहिष्णुता पर क्षुब्ध भी होते हैं|दरअसल कुछ जीवन मूल्य नामक बातें थीं वे हमारी स्मृति में भी संभवतया अब नहीं रहीं|कभी जब बड़ी घटनाएं होती हैं तो वे अचानक कौंध जाती हैं|
गांधी की बातें न समझने तथा उन्हें अपर्याप्त व अप्रासंगिक मानने के फैशन भरे वक़्त में हमें उन्हीं के सामने घुटने टेककर अपने लिए एक अहिंसक समय की दरकार करना होगी, अहिंसा यदि हमारा जीवन मूल्य फिर बनेगा तभी हम एक कारगर चुनौती दे सकते हैं हिंसा को |
- मिथलेश शरण चौबे
मनुष्य का अतीत से अब तक का सफ़र हिंसा से आक्रान्त रहा है,बुद्ध पुरुषों-धर्मग्रंथों आदि के अहिंसा सम्बन्धी आग्रहों के बावजूद मानव जाति हिंसा की पनाहगार बनी रही| भले ही बोलचाल में हम ऐसा मानते रहे कि हिंसा कुछ उद्दंड लोगों का कायर हथियार है लेकिन बहुसंख्यक आबादी का प्रतिरोध न करना भी उन्हीं हिंसक लोगों के पक्ष में खड़े होने जैसा है |हम आज भी दैनिक जीवन में देखते हैं कि जो लोग आक्रामक होकर कोई काम करा लेते हैं वही काम विनयपूर्वक निवेदन पर कतई नहीं होता |यह दरअसल हिंसा को स्वीकृति देने की शुरुआत है|
छत्तीसगढ़ की ताजा हिंसक वारदात के बहुत सारे विश्लेषण हो सकते हैं जिनमें अपनी-अपनी सामाजिक राजनैतिक समझ और निष्ठा की धार शामिल रहेगी किन्तु सरल अर्थ में हम इसे मनुष्य के लगातार और हिंसक होते चले जाने तथा हिंसा की बढ़ती स्वीकार्यता की तरह ही देखें |आम आदमी और ख़ास आदमी का चलताऊ फर्क हम भले ही करते हैं लेकिन हिंसा के सामने ये अंतर बेमानी हैं, बल्कि यहीं आकर सबकी हैसियत एकमेक हो जाती है जो कि दरअसल होती ही है | राजनैतिक पार्टियों का काम अपने विचारों यदि उनके पास कुछ रहते हों तो,को सार्थक मानना व दूसरी पार्टियों की नीतियों-कृत्यों की निंदा करना उन्हें जन विरोधी साबित करना है ,यह काम सारी पार्टियां तत्परता के साथ करती हैं |चुनाव में जिन मसलों को फसल की तरह काटा जा सके उन्हें मुद्दा बनाना भी उनका परम कर्तव्य होता है |
हिंसा वह विकृत अमानवीय हथियार है जिसका चरम लक्ष्य समूचे जीवन को नष्ट करना ही है ,यहाँ कोई मेरा तुम्हारा नहीं है यहाँ जो है वो मारा जा सकता है ,जो अभी नहीं है के मारे जाने के जरूरी इंतजाम हैं,या कोई जन्म ही न हो ऐसी जीवन विरोधी मंशा है| हम एक घटना की सतही व्याख्या कर मुक्ति पा लेते हैं,उस मूल विषय को नजरअंदाज करते हैं जिसके चलते घटनाएं होती हैं|हिंसा से कोई नहीं बच सकता स्वयं हिंसा के अस्त्र से मनुष्य को इच्छित नियंत्रण में रखने का मुगालता पाले बैठे अमानुष |
राजनैतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति के अभाव का रोना रोते हुए बहुत समय बीत रहा है |उनका काम सही सिरे से समस्या को निराकृत करना है भी नहीं ,वह सभी मनुष्यों का काम हैं |किसी करिश्माई व्यक्तित्व के अवतरण की प्रतीक्षा करना अपनी जवाबदेही से बचना है |हम आत्मावलोकन करें कि कैसे बहुत छोटी घटनाएं या स्थितियां अंततः हिंसक रूप ले लेती हैं और उनसे हम कितनी आसानी से बच सकते हैं| हमारे आसपास बहुतायत होती रहती बेवजह की आक्रामक घटनाओं पर हमारा रवैया उदासीन और संवेदनहीनता की ओर क्यों चला जाता है|दूसरों के अतिक्रमण को हम सरलता से स्वीकृति-सी क्यों देने लगे हैं | हमारी अपनी जरूरतें क्यों दूसरे के अतिक्रमण से पूरी होती हैं|आखिर क्यों विनय,संवेदना,संगति से सरककर हम निर्मम,संवेदनहीन,अराजक होने की तरफ चले जाते हैं|मानवीय प्रतिक्रियाएं क्यों अपर्याप्त लगने लगी हैं|
खुद तो हम भाषा में वाणी में व्यवहार में कठोर होते जा रहे हैं और समूचे परिवेश में पसरती जा रही असहिष्णुता पर क्षुब्ध भी होते हैं|दरअसल कुछ जीवन मूल्य नामक बातें थीं वे हमारी स्मृति में भी संभवतया अब नहीं रहीं|कभी जब बड़ी घटनाएं होती हैं तो वे अचानक कौंध जाती हैं|
गांधी की बातें न समझने तथा उन्हें अपर्याप्त व अप्रासंगिक मानने के फैशन भरे वक़्त में हमें उन्हीं के सामने घुटने टेककर अपने लिए एक अहिंसक समय की दरकार करना होगी, अहिंसा यदि हमारा जीवन मूल्य फिर बनेगा तभी हम एक कारगर चुनौती दे सकते हैं हिंसा को |
Thursday, 6 June 2013
Wednesday, 2 November 2011
अकेला मनुष्य
सामाजिक धार्मिक राजनैतिक
प्राणी रहते हुए मनुष्य
आर्थिक भौगोलिक जैविक दार्शनिक
प्राणी भी रहता रहा
बहुत सारे और भी प्राणी हुआ वह
अकेला मनुष्य
बहुत पहले नहीं रहा
बहुत पहले उसने अपने
स्वतंत्र मनुष्य होने की
एकमात्र शाश्वत आकांक्षा
लगभग खो दी
कुछ समय पहले
बिना किसी चमत्कार के
घटित हुआ यूं कि
अन्ना हजारे नाम हुआ एक मनुष्य का
हमारे अपने नाम से ज्यादा आकर्षक
और काम से लाख गुना
ज्यादा सार्थक
ज्यादा सार्थक काम में अपने हाथ बंटाने
बहुत सारी परिभाषाओं से लदे
बहुत सारे मनुष्य आगे आये
आगे आये मनुष्य
अकेले मनुष्य नहीं थे इस बात का
ध्यान नहीं रहा उन्हें
उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि
यदि वे एक मनुष्य अन्ना के पक्ष में
कहेंगे कुछ तो वे
मनुष्य होने से थोड़ा
और दूर चले जायेंगे
हालांकि अबकि वे
भाजपा माकपा भाकपा तेदेपा
आदि हो सकते हैं
वे हो तो सकते हैं आरएसएस के एजेंट भी
बस दो वाक्य सत्ताधारी पार्टी के
खिलाफ बोलना ही तो हैं
लोग, जनता, रियाया, आवाम, मनुष्य
इन सभी शब्दों से
लगातार एक पीड़ा झलकती रहती है
यदि ये सभी कांग्रेस भाजपा बसपा
राजद लोजपा तेदपा माकपा
भाकपा द्रमुक अन्नाद्रमुक तृणमूल
शिवसेना अकाली आदि में
तब्दील हो जाएं तो
विलुप्त हो जायेंगी पीड़ाओं से
खदबदाती सारी दुखों की नदियां
कोई मनुष्य मात्र नहीं बचा
सबसे अचूक नुस्खा है
मनुष्य को दुख से उबारने का
अबकि यदि बच गए हों
धोखे से कुछ अकेले मनुष्य मात्र
तो वे भी आखिर करेंगे क्या
रात में अक्सर एक सपना आता है
एक अधनंगा आदमी चश्मा पहने
लाठी टेकते तेजी से जा रहा है
और आश्चर्य यह कि उसके पीछे
असंख्य अकेले मनुष्य मात्र
जा रहे हैं|
प्राणी रहते हुए मनुष्य
आर्थिक भौगोलिक जैविक दार्शनिक
प्राणी भी रहता रहा
बहुत सारे और भी प्राणी हुआ वह
अकेला मनुष्य
बहुत पहले नहीं रहा
बहुत पहले उसने अपने
स्वतंत्र मनुष्य होने की
एकमात्र शाश्वत आकांक्षा
लगभग खो दी
कुछ समय पहले
बिना किसी चमत्कार के
घटित हुआ यूं कि
अन्ना हजारे नाम हुआ एक मनुष्य का
हमारे अपने नाम से ज्यादा आकर्षक
और काम से लाख गुना
ज्यादा सार्थक
ज्यादा सार्थक काम में अपने हाथ बंटाने
बहुत सारी परिभाषाओं से लदे
बहुत सारे मनुष्य आगे आये
आगे आये मनुष्य
अकेले मनुष्य नहीं थे इस बात का
ध्यान नहीं रहा उन्हें
उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि
यदि वे एक मनुष्य अन्ना के पक्ष में
कहेंगे कुछ तो वे
मनुष्य होने से थोड़ा
और दूर चले जायेंगे
हालांकि अबकि वे
भाजपा माकपा भाकपा तेदेपा
आदि हो सकते हैं
वे हो तो सकते हैं आरएसएस के एजेंट भी
बस दो वाक्य सत्ताधारी पार्टी के
खिलाफ बोलना ही तो हैं
लोग, जनता, रियाया, आवाम, मनुष्य
इन सभी शब्दों से
लगातार एक पीड़ा झलकती रहती है
यदि ये सभी कांग्रेस भाजपा बसपा
राजद लोजपा तेदपा माकपा
भाकपा द्रमुक अन्नाद्रमुक तृणमूल
शिवसेना अकाली आदि में
तब्दील हो जाएं तो
विलुप्त हो जायेंगी पीड़ाओं से
खदबदाती सारी दुखों की नदियां
कोई मनुष्य मात्र नहीं बचा
सबसे अचूक नुस्खा है
मनुष्य को दुख से उबारने का
अबकि यदि बच गए हों
धोखे से कुछ अकेले मनुष्य मात्र
तो वे भी आखिर करेंगे क्या
रात में अक्सर एक सपना आता है
एक अधनंगा आदमी चश्मा पहने
लाठी टेकते तेजी से जा रहा है
और आश्चर्य यह कि उसके पीछे
असंख्य अकेले मनुष्य मात्र
जा रहे हैं|
साभार जनसत्ता - रविवारी , 23 अक्टूबर 2011 में प्रकाशित
जो नहीं है उसका क्या गम
हालॉकि शमशेर ने इस पंक्ति के आगे 'सुरुचि' शब्द रखा, हम जो चाहें वो रख सकते हैं। अपनी तरह से इसे आगे रचा जा सकता है, जाहिर है हमारे पास 'सुरुचि' तो लगभग नहीं है तो हम अपने अप्राप्त के दुख को ही यहाँ रख सकते हैं। बहुत सारा ऐसा हमारे पास नहीं है जिसका अक्सर हमें गम होता है। किसी के पास बड़ा मकान या कार या धन-दौलत नहीं है किसी के पास प्रेमिका नहीं, किसी के पास नौकरी नहीं या फिर ज्यादा आँखें फाड़ कर देखें तो बहुसंख्यक आबादी के पास दो वक्त का भोजन नहीं, बच्चों के पास सपने हैं पर बहुतों के पास स्कूल के तय जूते नहीं।
व्यापारी के यहाँ ढेर सारी दौलत है पर सुख नहीं। अच्छी खासी नौकरी कर रहे लोगों के पास रुतबा नहीं। कलमनवीसों के पास संपादकों-प्रकाशकों की कृपा नहीं। जो दुहने में कुशल हैं उनके पास गाय भैंस नहीं । कुशल कृषक के पास खेती नहीं। पढ़ने पढ़ाने में लिप्त रहने की आकांक्षा वालों पर व्यवस्था का विश्वास नहीं। यहाँ रुकना सचमुच बहुत जरूरी है क्योंकि 'नहीं है' का सिलसिला इतना व्यापक और दारुण है कि वह ही बहुत ज्यादा है जैसा सकारात्मक वाक्य छिछला लगता है।
इन ढेर सारे 'नहीं है' के साथ भी जीवन निरंतर आगे बढता है और ऐसा होना भी चाहिए लेकिन होना यह भी चाहिए कि 'जो है' और वह भी बहुत ज्यादा है को बार-बार याद करना। जैसे कि हमारे पास मनुष्यता के सबसे बड़े साक्षात् प्रतीक गाँधी हैं। गुलामी से मुक्ति का उदात्त वृत्तांत है।
इन ढेर सारे 'नहीं है' के साथ भी जीवन निरंतर आगे बढता है और ऐसा होना भी चाहिए लेकिन होना यह भी चाहिए कि 'जो है' और वह भी बहुत ज्यादा है को बार-बार याद करना। जैसे कि हमारे पास मनुष्यता के सबसे बड़े साक्षात् प्रतीक गाँधी हैं। गुलामी से मुक्ति का उदात्त वृत्तांत है।
ढेरों अपनी-अपनी तरह मनुष्यता को बचाने में लगे शोरगुल से दूर मनुष्य हैं। अपने को गलत समझे जाने के जोखिम के बावजूद जिद भरे ईमानदार हैं। स्वप्नों को सच में बदलने का जतन करते कभी पानी बचाते, कभी बाँधों के विस्थापितों को बचाते, कभी सच को बचाते, कभी स्वप्न को बचाते ओर कुल मिलाकर मनुष्यता को बचाते मनुष्य हैं, और जिन्हें सिर्फ इस बात पर भरोसा है कि यह बचना अत्यन्त सुघर है किन्तु बेतरतीब कामों की तरह ही है।
बहुतों के पास हमसे कम संसाधन हैं और वे कमी के दुख में भी सुख के क्षण पा लेते हैं। ढेर सारी लहलहाती वनस्पतियाँ, तरह-तरह के रंग बिरंगे पक्षी हमारे बिल्कुल आसपास हैं। हमारे पास एक अकेलापन भी है और जिसे हम चाहें तो बहुत अच्छे से जी और रच सकते हैं। आत्मवृत्त से थोड़ा सा आगे निकलें तो 'नहीं' का गम बहुत छोटा है, 'है' कि समृद्धि के सामने।
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